Taarif
By Kiran Tekawade
मैं शायर हूँ, और शायर का काम है करना बात निराली
बस इतनी ही बात है तो फिर कर लूँ मैं तारीफ तुम्हारी
मलमलते पोशाक तुम्हारे लेकर आए भाग बड़े हैं
भोले बनकर सबसे आगे तेरे दिल के पास खड़े हैं
लहरा जिसपे तेरा आँचल, हो बहके वो हवा नशीली
नाज़ुक तेरे लब छूते ही बन जाए हर बात रसीली
उस तकिये से जलन हुई है, जिसको कस के सोती बाहें
तेरे सुर को सुननेवाला और न फिर कुछ सुनना चाहे
वैसे तुम तो सभी तरह की तारीफों से वाक़िफ होगी
मैं भी क्या कुछ खास कहूँगा? चुप रहना ही तारीफ होगी!
पर कुछ बातें शायर कर ले, तो होती है रात निराली
लो! फिर तारें सुनने आए मेरे मुख से बात तुम्हारी
माथा, आरिज़, ठोढ़ी या लब? हर कोई था सुननेवाला
बिन लफ्ज़ों के, इन्हीं लबों से मैंने काफ़ी-कुछ कह डाला
तेरी ज़िद से मेरी हद में कोई काफ़िर घूमा होगा..
चाँद समझ के होंठ जले हैं, शायद सूरज चूमा होगा..!
By Kiran Tekawade

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