Taana Baana
By Dipti Mishra
धागों का ये ताना बाना,
यूँ ही तुमको ढक गया ।
बुने थे मैंने अपने सपने भी
इसी बुनाई में,
पर तुझको अहसास भी न
हो सका ।
ये केसा मंजर था मेरी आखों के सामने,
यूं तो तू खडा था मेरी ही बुनाई में
पर उसमें महक किसी और की ही थी ।
हैरान थी मैं ये सोचकर कि
इस बुनाई में तू अच्छा लगा
या इस महक ने तुझे अच्छा बनाया
पर संतोष भी था
महक भी तो मेरे ताने बाने के उपर ही थी,
बस जरा सी धूप की जरूरत थी ।
By Dipti Mishra

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