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Strings Of Growing Heart

Nov 12, 2022
5 min read

By M. K. Sameer


1.

जिन आंखों के गहरे समंदर मैं कभी डूबा हुआ था मैं

और उन्न आंखों के नूर की खिलती वादियों मैं बैठा हुआ था मैं ।

जब सूरज चाँद लहराती हरियाली और चहचहाते हुए परिंदे भी लुभाते न थे,

फिर एक गुलाबी होठो की मुस्कान से ललचाने लगा था मैं,

चमकते आईने की रोशनी भी फीकी पड़ गयी थी,

जब नूर बिखेरा उसने तब आँखों पर धुन्ध सी पढ़ गयी थी।

फिर न जाने किस की नज़र मैं स्याह रात की कालीक थी,

की लबो से निकले अल्फ़ाज़ भी छुरी बन गए,

कसमे वादे टूट गए और पराये अपने बन गए

वादों की झालर से कुछ मोती यूँ बिखरने लगे

की झुक कर उठाने दौड़ा तो उलझ कर सब बिखर गए।

अब तो हाल ये है कि जिन लबो पे हक़ कभी मेरा था

आज शायद उनहे देखना भी नसीब नही,

और जिनकी कभी उम्मीद न थी वो उसके साहिब ए मसनद बन बैठे है।

इक़रार भी अब इनकार बन चुका है और

तकरार भी अब फटकार हो चुकी है

शायद दिल के किसी कोने मैं कहीं कुछ बचा हो

बस इसी उम्मीद से जीता जा रहा हूँ मैं वरना मौत तो उसके कदमो के साथ ही हो चुकी है मेरी






2.

लाल लम्हे

महीने के हर आखिर मैं जब आते है वो लाल लम्हे

करके यूँ सब प्यार हम ही से दिखलाते है काले चेहरे

कुछ मसीम से फूलो को करके रंगीन सुर्ख लाल

क्या गलती है उनकी भी अब ये बद्लाडो तत्काल

नज़रे चौड़ी करके यूँ धुत्कार के करके यूँ बेहाल

क्या अपनी मां बेटी के साथ भी करते हो यही कमाल ?

जिसने तुमको पाला है महीनो उस कोक मैं

वो भी गुज़री होगी दर्द से कभी घर पर कभी किसी चौक मैं

क्या फिर तुम अब रोकोगे कुछ खाने से कुछ पीने से ?

दर्द भी यूँ कम हो जाता न रोकते अगर तुम दरगाह या मंदिर जाने से

कुछ सुख भी मिल जाता पर रोक लगा दी तुमने उसको खाने से,रसोई जाने से ?

महीने के हर आखिर मैं जब आते है वो लाल लम्हे

करके यूँ सब प्यार हम ही से दिखलाते है काले चेहरे


न होता वो दर्द तो पैदा न होता एक इंसान

जिस मिटटी पर जीते हो तुम न होता वो भी हिन्दुस्तान

चाहे माँ की ममता हो या हो मदर टेरेसा

फिर बाई लक्ष्मी को या प टी उषा

सबने सहा है वो दरडी निराला

करकेक कोशिश जवाब अब दे दो।

न हो कमज़ोर न हो अब अबला

तुमने ही तो सिखाया है

सारे काम भी करना

चाँद लोगो से भी अब क्या डरना ?

ये कुछ बाते है जो कहे अनकहे राज़ गहरे है

हर दिन के पहर मैं लाज के पहरे है

हर सियाह रात के बाद कुछ उजाले सवेरे है

कुछ पराये है कुछ अपने ही चेहरे है

महीने के हर आखिर मैं जब आते है वो लाल लम्हे

करके यूँ सब प्यार हम ही से दिखलाते है काले चेहर।


3.

माँ की दुआ

की सुना तो होगा सब ने ही की खता सबसे होती है

लेकिन हर गलती को जो दर गुज़र कर दे वो सिर्फ माँ होती है

प्यार न जताकर भी जिसका प्यार उमड़ जाता है

हाँ उसी के ही पैरो मई मेरी जन्नत होती है

गम तो ज़िन्दगी भर मिलते ही है सबसे

उन् गमो को सहने की ताक़त बास मेरी माँ ही देती है

और जब आता है गम हो जाता हूँ सबसे यूँ जुदा

बास तुम ही पास दिखती हो जैसे हो मेरी खुदा

दूर रहकर भी तुझे मई दिल क क़रीब पाता

न जाने घर में घुस के क्यों सलाम अम्मी चिल्लाता हूँ

यूँ तो दुनिया कहने लगी निकला हूँ अकेला ही सफर के लिए

उन्हें क्या पता हर कदम पर तेरी दुआ भी साथ है

और यहाँ तन्हाइयो मई जब भी अश्क़ अकेला बहाता हूँ

तुम्हारी आवाज़ भी न जाने कैसे सुनाई पड़ती है

सब कहने लगे अब तो लड़ न सकूंगा ज़माने से

बेवक़ूफ़ है सब उन्हें क्या पता

कितनी ताक़त मिलती है तुम्हे गले लगाकर

की सुना तो होगा ही सब ने ही की खता सबसे होती है

लेकिन हर अल्टी को जो दर गुज़र क्र दे वो सिर्फ माँ होती है

याद आजाता है की ज़िन्दगी बीती कैसे ख़सारे में

उठते ही चेहरा जो देखता था तुम्हारा

कीमत नहीं थी जब उस वक़्त की की कितनी रौनक है उस ही नज़ायरे में

की याद है मुझे वो सर्द राते

जब सोया तो अकेला ही उठा तो कम्बल भी साथ था मेरे

और बोहत खुश नसीब हूँ मई की मेरे लबो को जन्नत बता दिया

हाँ जब मेरी माँ के कदमो को मुझसे चूमा दिया

नींद की धुंध और बदन मई बुखार की तपिश होती थी

फिर भी मेरी भूख से वो घर का चला जला देती थी

की सुना तो होगा सब ने ही की खता सबसे होती है

लेकिन हर गलती को जो दर गुज़र कर दे वो सिर्फ माँ होती है


4.

है कुछ सुराख मेरे खुद के प्यालों में

भूके प्यासे मिस्कीनों का क्या अब सवाल नहीं होगा ?

मखमल की गद्दी पर भी सुकून नहीं जिसको

क्या हाशर मै उस से सवाल नहीं होगा ?

+

मैदान साफ है, खुला है आसमान, सर्द है हवाएं

क्या फिर हमें धूप का इंतेज़ार नहीं होगा ?

दबे कुचले शहज़ादों के ताज की नीलामी है,

फिर उनके धोखे मै हम पर वार नहीं होगा ?

खुलासा है की नया खुलासा अब नहीं होगा,

सितमगरो का नया तमाशा नहीं होगा,

है ज़ूल्फेकार सी अब अली के दीवानों मै

ज़ुल्मी के फसादों पर सब्र का इशारा नहीं होगा।

ज़र्रा बराबर है ईमान तो डर का किरदार नहीं होगा

शहसवारों सी है फितरत तो इंकार अब नहीं होगा

है चंद सांसों की ज़िन्दगी समीर

शाहीन के सफर मै करगज़ सा इंतेकाम नहीं होगा


5.

यूँ तो जाम ए मोहब्बत का मैखाना हूँ,

मगर समंदर से भी ज़्यादा प्यासी है रूह मेरी

दिल अगर हो जिस्म मैं, तो प्यार का तैखाना हूँ,

मैं इस कदर डूबता नही जान ए वफ़ा मैं जो हो जाती तू मेरी।


6.

है गुल खिला अभी कहीं,

खुशबू है उसका सबूत क्या ?

फासले थोड़े नहीं,

क्या खव्वाईशी पर सवाल है?


7.

खुद की जिंदगी को यूं ही अब क्यों खुली

किताब करूँ ??

जब अपनो की ही वफ़ा नही की तो गैरो

से भी क्या हिसाब करूँ ??


8.

अंधेरी रात मै जुगनू की तरह चमकती सी ज़िन्दगी,

मेरी मां के आंखो मै मेरी झलकती सी ज़िन्दगी

किताबो के पन्नों मै फिर ढूंढ़ते क्या हो समीर ?

उसके क़दमों मै पड़ी जन्नत सी ज़िन्दगी ।


9.

समीर एक अरसा हुआ है की रात नहीं हुई,

काफी दिनों से उनसे मुलाक़ात नहीं हुई।

अब लगता है की ये आफताब कब ढलेगा ?

काग़ज़ के टुकड़े कोरे रह गए किताब नहीं हुई।


10.

اتار دیتا ہوں چند الفاظوں کو اس کورے کاغذ پر

کئی رسالے میں خود کی زندگی بھوندی نہیں جاتی

उतार देता हूं चंद अल्फाजों को इस कोरे कागज पर,

की रिसाले मैं खुद की जिंदगी ढूंढी नहीं जाती।


11.

बदनामी के घरौंदे की चौखट को पार कर,

खामोशी के टूटे प्यालों को तार कर

सिलकर अपने होठं मैंने भी खंजर खाया है

हौसला कम है, अदल पर इख्तियार कर,

थोड़ा और इंतजार कर

थोड़ा और इंतजार कर।


By M. K. Sameer




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