Shuruaat
By Kiran Tekawade
ज़िन्दगी से परेशान हो ? पर ज़रूरी नहीं कि परेशान बनके चल..
जब चलना ही है तो क्यूँ ना मुस्कान बनके चल..
यूँ नाराज़ न हो ज़िन्दगी से.. ये उतनी मुश्किल भी नहीं..
थोड़ी-बहुत आसान भी है.. जरा आसान बनके चल..
कभी किसी सपने में खो जाया कर..
कभी यूँ ही जी भर के सो जाया कर..
कितना सख्ती से पेश आते हो खुद के साथ..
कभी कभी बच्चा भी हो जाया कर..
बेख़ौफ़.. बेलगाम.. बिना किसी दिखावे के..
पूरे समंदर पे राज करती नन्ही सी नांव बनके चल..
माँ की उँगली पकड़कर चलना सीखा था कभी..
पालने से निकला वो पहला पांव बनके चल..
ज़िंदगी एक रेल का सफ़र है..
शुरआत है.. अंत है, तय है..
तो क्यूँ ना ये सफ़र खुल के जिया जाय..?
क्यूँ ना इस फासले को आसान किया जाय..?
तेरी बोगी में बहुत से अनजान रिश्ते बनते जाएँगे..
तू किसीसे लगाव लगा न बैठ..
वे अपना स्टेशन आते ही उतर भी जाएँगे..
हर कोई तेरे सफ़र में और तू हर किसी के सफ़र में
एक किरदार निभाता है..
एक हिस्सा बिताता है..
तो क्यूँ ना इस हिस्से को किस्सा बनाया जाय..?
क्यूँ ना ये सफ़र खुल के जिया जाय..?
वैसे एक ना एक दिन तेरा भी स्टेशन आएगा..
तेरा भी टिकट ख़त्म हो जाएगा..
train पटरी से उतरने का डर भी तो है..
ऐसे या वैसे.. उतरना तो तुझे भी है..
तो हो जब तक सफ़र में.. आसमान बनके चल..
इतना जी हर पल.. के दास्तान बनके चल..
तू बस चलने का हौसला रख..
रास्ता अपनेआप बन जाएगा..
बस गर्दन ऊँची उठा..
सीना अपनेआप तन जाएगा..
चूहों की race दौड़े जा रहे हो..
समाज रोया तो रोए जा रहे हो..
बागी बन.. अपनी नादनीपर हँस पड़..
जब भी धुंधलाएगी राहें..
लबों पे पहले चाँद की आड़ी लकीर आने दे..
छोटे-छोटे लम्हों को खिल जाने दे..
इन्ही लम्हों में भरी पड़ी है ज़िन्दगी..
तेरी ज़िन्दगी ज़िन्दगी से मिल जाने दे..
तो चल.. कुछ नया करें..
फेफड़ों में साँसे कुछ नयी भरें..
एक नयी उड़ान.. नया आगाज़ करें..
जो कल के लिए छोड़ा है.. आज करें.. अभी करें..
तो ड़ाल पहला कदम..शुरुआत बन के चल..
फल की पर्वा न कर.. शुरुआत बन के चल..
पहली धड़कन..
पहली साँस..
पहली नज़र..
पहला ख़याल..
पहली आहट..
पहली ख़्वाहिश..
पहली पसंद..
पहली उम्मीद..
लबों से निकली वो पहली बात बन के चल..
शुरुआत बन के चल..
चल.. शुरुआत बन के चल..
By Kiran Tekawade

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