Seva Aur Urja
By Deepak Kumar Agrawal
सेवा मेरा कर्तव्य था,
ऊर्जा मेरी पहचान।
हौसला मेरा मजबूत था,
नही थी ज़िन्दगी मेरी आसान।
मेरी ज़िंदगी कठिन थी,
वक़्त ने भी कई मर्तबा रुलाया था।
पर अपनो को अपने सामने जबभी देखा,
झूठी हँसी ने भी मुझे हँसाया था।
स्तिथि मेरी कमज़ोर थी,
बल का प्रयोग करना नही आता था।
पर किसीको दर्द में जबभी देखा,
उसे संभालना मुझे आता था।
लड़ा नही विरोधी से,
ज़िन्दगी ने यह कहाँ सिखाया था।
माँ भारती ने तो मुझे,
सिर्फ सेवा करना सिखाया था।
उदासी को खुशहाली का,
पर्दा नही बनाना हैं।
सेवा एवं ऊर्जा के साथ,
अपना अद्याय खुद रचाना हैं।
By Deepak Kumar Agrawal

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