Sapnon Ko Sandesa
By Tanuja Thakur
सपनों को संदेसा..
सपनों को संदेसा भिजवादो संभल कर रहे,
आवारगी उनकी पुरानी आदत है…
कब किस वक़्त गुमराह हो पार कर जाए सरहदें,
और बह निकले अपनी ही बेफिक्री में…
सागर की संजीदा लहरें नहीं हैं ये,
जो किनारे पे जा कर वापस लौट आती हैं…
बताई हुई मंज़िलें तलाशना उनकी फितरत नहीं,
ये तो कहीं भी बस राह पकड़ चल देते हैं…
कभी ठहर जाते हैं किसी मुकाम पे,
तो कहीं बिना पीछे मुड़े आगे बढ़ लेते हैं…
उन्हे ढूँढने यथार्थ को भी गर जाना पड़े,
हाथ पकड़ कर मनाना पड़े, तो आसान नहीं।
सपने तो बिगड़े हुए नवाब हैं,
मचल जाते है अपनी ज़िद पर तो कहाँ मानते हैं?
यथार्थ को ही समझा दो कि छोड़ दे उन्हे उनके हालात पे,
क्या पता, कल सफ़र मुक़म्मल हो जाए।।
By Tanuja Thakur

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