Samatva
Updated: Dec 5, 2022
By Siddharth S Parekh
ये हैरानियाँ लिए
कब तक चलोगे तुम
कब तक चलोगे तुम
आँखों में सपने
आँखों में सपने लिए, दिलों में खौफ भरे
कब तक चलोगे तुम
कब तक चलोगे तुम
हर पल
हर पल तेरी परीक्षा हो, चरित्र पर सवाल उठे
यूँही,
कब तक चलोगे तुम
कब तक चलोगे तुम
हैं तुझसे लिपटी
हैं तुझसे लिपटी ये बेड़ियां, कर इनको भस्मा तू
बनाके शस्त्र, करले युद्ध की हूंकार तू,
युद्ध की हूंकार तू
न कर परवाह इस समाज की
न कर परवाह इस समाज की,
जो तुजे न समझ सका, वो तुझे क्या मिटाऐगा
पूछ इस समाज से
जिस वक़्त के तकाज़े में मिट गई ज़ांज़ीरियां
क्यों न मिट सकी, फर्क की ये बेड़ियां
फर्क की ये बेड़ियां
तू दीपक की लौ नहीं
तू दीपक की लौ नहीं
तेज की वो मशाल है, जिसकी लपटों से
गगन भी कप कपाऐगा
गगन भी कप कपाऐगा
हैं ये तेरे हक़ की लड़ाई
हैं ये तेरे हक़ की लड़ाई, न कर संकोच तू
बनके रूद्र, कर प्रतिघात तू
कर प्रतिघात तू
तू उठ
तेरे वुजूद की मांग
समय को भी क़बूल है
समय को भी क़बूल है
समय को भी क़बूल है
By Siddharth S Parekh

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