Sahil
By Abhishek Garg
मैं साहिल पे खड़ा आज भी उसका इंतजार करता हूं,
हर खिलते आफताब के साथ उसी को याद करता हूं,
हाथ उठाते है,
उठते है मगर उसकी दुआ के लिए,
चिराग जलते है समंदर में भी
मगर उसकी फरियाद के लिए,
वो शायद थी ही कोहिनूर जैसी जिसे देखते ही मोहब्बत हो जाए,
उफ्फ वो ब्लू डेनिम ब्लैक एविएटर्स खुले बाल और उसकी मुस्कान
या शायद में ही बेताब था कि काश उनको भी हमसे मोहब्बत हो जाए
मैं समंदर की हर लहर में उससे महसूस करता हूं,
में साहिल पे खड़ा आज भी उसका इंतजार करता हूं|
By Abhishek Garg

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