Sahaj
By Arpit Pokharna
इन बेइंतहा लंबी रातों के साये अब ख़ौफ़ पैदा नहीं करते आँखें आदी है देखने को अब कालिख में प्रतिबिंब झूमती लहराती कद बदलती परछाइयां और कानों को शून्य करती ये हवा मैं मेरे डर से काफ़ी हद तक सहज हो चुका हूँ यक़ीन नहीं आता है कभी कोई रंग भी था सब स्याह लिप्त है नज़र भर कभी तो धूप का रंग हो सफ़ेदी रहे नीले आसमान में फिर डर मेरा मुझे छोड़ जाएगा और मैं फिर किसी के छोड़ जाने के डर से सहज हो जाऊंगा
By Arpit Pokharna

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