Safed Kaagaz
By Damini Akhilesh Dubey
एक सफेद कागज़-सा चुपचाप,
कुछ शांत-सा है मुझमें।
मैं खड़ी इस भीड़ में
फिर क्यों एकांत-सा है मुझमें?
क्या करूँ इस कागज़ का?
नया आकार दूँ इसको,
या बिखेर दूँ कोई स्याही
और ढेर सारा प्यार दूँ इसको।
नहीं घुलना नाव बनकर
नदी की धारों में मुझे,
बनूँ किसी किताब का हिस्सा
सब याद करें विचारों में मुझे।
मैं कोई किस्सा या कहानी नहीं
एक लेख बनना चाहती हूँ,
सुनहरा न सही ऐतिहासिक हो
वो सुलेख बनना चाहती हूँ।
ये सफेद कागज़-सा जो है,
वो कोरा ही सही,
नहीं रंगना इसपर कोई रंग,
ये मेरी शान-सा है मुझमें।
खुश हूँ कि कुछ शांत-सा,
एकांत-सा है मुझमें।
जो भी है रहने दो,
येमेरीपहचान-साहैमुझमें।
By Damini Akhilesh Dubey

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