Safar
Updated: Jul 29, 2025
By Mridul Tiwari
अनजानी राह में, सुकून की चाह में
चलता ये रस्ता, फिर से मैं निकला लिए मेरा बस्ता शहरों से बढ़ता, गांवों में चलता
रात का अंधेरा, सुबह की ये धूप
हज़ारों है मंज़िलें, लाखों हैं रूप
पहाड़ों की सिकुड़ती ठंड में
गर्म चाय की प्याली बड़ा सुकून लाती है
झुलसती गर्मी में ठंडी बारिश
वही कहानी दोहराती है
फकीर सा इस रस्ते में मैं
मुसाफ़िर लाखों टकराते हैं
कुछ दिल में, तो कुछ दिमाग में
यादें गहरी छोड़ जाते हैं
अनजाने इस रास्ते में, कब अपने से नज़र आते हैं बढ़ते इस सफर में,जल्द अलविदा कह जाते हैं खूबसूरत
इस सफर में, मदहोश सा मैं फिरता हूं मंज़िल की चाह नहीं, रास्ते हज़ारों गुज़रता हूं।
By Mridul Tiwari

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