Saala...Is Desh Ka Kuch Nahi Ho Sakta
By Ashish Nagori
साला,
इस देश का कुछ नहीं हो सकता
मैंने भी कहा , मैंने भी सुना
फिर भी हर रोज़, इसी देश में
एक सुन्दर कल का सपना बुना
थोड़ा हालात का मारा,
थोड़ा ज़रूरत से मजबूर
घबराहट की आँधी में,
रोज़ सपने होते रहे चूर ,
दिल पे आए वो सारे भार
जो कंधा नहीं ढ़ो सकता
साला,
इस देश का कुछ नहीं हो सकता
हम में ...............आक्रोश बहुत है,
कुछ दिन रहने वाला जोश बहुत है,
कुछ अनहोनी होगी तो चर्चा करेंगे,
जलती मोमबत्तियों पर खर्चा करेंगे,
हम तब तक इंडिया गेट पर बैठेंगे,
जब तक किसी दामिनी का बाप,
रो सकता
साला,
इस देश का कुछ नहीं हो सकता
सरहद पर कितने सहारे खो गए माँ बाप की आँखों के तारे खो गए मेहंदी, कुमकुम, शृंगार खो गए बहनो के त्यौहार खो गए किसान भाई की ज़मीन खो गयी रोती आँखों की नमी खो गई गरीबी में व्यापार खो गए जीने के अधिकार खो गए सब कुछ खोने के बाद भी, इस देश में तू संयम नहीं खो सकता साला, इस देश का कुछ नहीं हो सकता धर्म से बँटा हुआ, धर्म में बँटा हुआ भविष्य जानता है, पर आज से कटा हुआ जाहिलो का कारवां है, काफ़िला बना हुआ है मनुष्य आज का, किस बात पर तना हुआ खोखला सा लग रहा, विश्वास इतिहास पर आती है हसीं मुझे, लोगों के आभास पर जिनको फुर्सत ना मिली, कभी रोटी के जुगाड़ से आज वो भी चीखते है, तलवारों की आड़ से कौन कहता है, कि दिल की है यहां बंजर ज़मीन कितनी आसानी से कोई , नफ़रत के बीज़ बो सकता साला, इस देश का कुछ नहीं हो सकता
By Ashish Nagori

Comments