Rang Prasang
By Vivek Upadhyay
जब एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के बारे में सोच कर यह निष्कर्ष निकाल रहा हो की वो उसके जीवन की सबसे रंगीन कल्पना हैं तब ऐसी ही एक कविता की रचना होती हैं जो नीचे लिखी है । जीवन की कल्पना जब ज़िंदा मूरत बन कर सामने आ जाए तो उसकी व्याख्या अपने आप सुसज्जित एवं प्रेम स्वरों से भर जाती हैं ।
रंग प्रसंग
तुम लगती हो मुझे मेरे सपनो की पारी,
जिन रंगो में सजाई मन्न में मूरत,
उन्ही रंगों को बिखेरती मेरी कल्पनाओ की झरि,
गुलाबी रंग खिलता है तुमपे,
हो गाढ़ा तो और सजता है तुमपे,
लाल रंग में लगती हो अप्सरा,
सफ़ेद में जैसे कोई जादू हो बिखरा,
हलके येलो में तुम सावन सुनेहरा,
काले रंग में चाँद सा चेहरा,
लगती हो काली रात में जुगनुओं का बसेरा,
खिलखिलाती हो तुम गुलाब की तरह,
हर रंग हर मौसम में तुम महताब की तरह ,
सब रंग खिलते हैं तुमसे, तुम रंग से नहीं , रंग निखारते हैं तुमसे,
देखि हैं मैंने सब तसवीरें तुम्हारी,
दिल में उत्तरी हो तुम बन के धड़कन हमारी .
रख दें जो तुम्हारे कदमो में जान हमारी,
पूरी नहीं हो पाएगी हमसे इबादत तुम्हारी,
प्यार हो गया हैं तुमसे तुम जन्नत हमारी,
ये अलफ़ाज़ बन गए हो तुम,
तुमसे ही ये ज़िन्दगी की नज़्म हमारी ।
By Vivek Upadhyay

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