Raju Ki Azadi
By Sumeet Kumar
देश मे चारो ओर हर्षोल्लास है
आज स्वतंत्रता का दिन है
कपड़ो से लेकर मन तिरन्गे मे रंगा हुआ है
स्कुल, कॉलेज, ऑफिस सब इसी रंग से भरे हुए है ।
इन सब के बीच आज राजू भी खुश है
और हो भी क्यों नहीं
सुबह जब एक ट्रक के जोरदार हॉर्न से उसकी नींद खुली
तो दूसरी तरफ स्कुल बस मे जा रहे बच्चो को देखकर उसे लगा की आज तो तिरन्गे का दिन है ।
तिरंगा- हमारा गौरव, हमारी आज़ादी का सुचक
राजू के लिए तिरंगा खैर कई साइज मे आता है
छोटा- दो रूपये, मीडियम-चार और बड़ा-आठ रूपये
वो तिरंगा बेचते वक़्त ज़ोर -2 से जय हिन्द चिल्लाता है
हर आने जाने वाले को नंगे बदन राजू देशभक्ति की चादर ओढ़ाता है
यहाँ से खाली होकर दोपहर मे वो बस्ती के मंदिर जाएगा
वहां आज लड्डू मिलता है
फिर बाजार के सरकारी स्कुल,
वहां तो रात के खाने का भी इंतज़ाम होता है ।
मतलब आज राजू आज़ाद है
रोज आती-जाती गाड़ियों की मिलने वाली गालियों से राजू आज आज़ाद है
अपनी बहन को गोद मे लेकर उन्ही गाड़ियों के शीशे नीचे उतरवाने से आज़ाद है
सुबह-शाम के खाने की फ़िक्र से भी वो आज आज़ाद है
दोपहर तक की बिक्री के बाद राजू एक तिरन्गे के साथ सड़क पर ओझल हो जाता है
पर अपने पीछे एक सवाल छोड़ जाता है-
की आज़ादी आखिर क्या है?
हमारी और उसकी आज़ादी मे इतना अंतर क्यों है?
मतलब नहीं समझ आये तो तिरन्गे पर ही गौर कीजियेगा,
मतलब शायद खुद ही समझ आ जाएगा
की क्या देश की आज़ादी मे उसकी आज़ादी छिपी है
या उसकी आज़ादी मे देश की।
By Sumeet Kumar

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