Raatein
By Shlok Jain
कुछ रातें इस कदर आती है,
बेचेन दिल, आखों से ओझल नींदे,
बिन सोए, बस यू ही गुजर जाया करती है,
कुछ रात इस कदर आया करती है।
शांत- सन्नाटा बिखरा हुआ चारो ओर,
साथ बस खुद का होता है,
अक्स भी ना हो साथ जब, शायद वो पल बहुत डरावना होता है,
कुछ चुभ सा रहा होता है अकेला पन,
कुछ रात इस कदर सताया करती है।
बैठे होते हैं बस इंतजार में,
कुछ हवाएं साथ ले भी आती है,
वो अहसास, वो लम्हा,
महसूस कराती, बस एक स्पर्श,
और फिर से यू ओझल हो जाती,
कुछ राते ऐसे साथ बिताती।
बैठ के कहीं, हम भी आनंद लेते हैं उन हवाओ का,
साथ जो चांद के साथ आकर भी, बस अकेले में यू छू जाति,
कुछ राते बस इसी तरह बीत जाती।।
By Shlok Jain

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