Raat Ho Gayi
By Khushbu Sharma
तेरे लौटने की आस में,
फिर एक शाम गुजर गयी
फिर वही रात हो गयी।
दिनों के शोरगुल से तो यह बात कट गई,
डूबते हुए सूरज की रोशनी ,
जाते जाते मेरी मुस्कान को भी ले गयी
फिर वही अकैलेपन से मेरी मुलाकात हो गयी
कि फिर वही रात हो गयी।
न जाने क्यूँ थमता ही नहीं है
इन जालिम रातों का सिलसिला,
कि फिर मेरे तकिये से इन आसूंओं की
मुलाकात हो गयी।
कि फिर वही रात हो गयी।
सुबह के उगते सूरज को देख,
उन पक्षीयों की चहकती हुई आवाज को सुन
उम्मीद सी जागी,
कि एक नयी सुबह कुछ तो नया पैगाम लायेगी ।
कि फिर वही शाम आयी,
फिर वही तेरे ,
न लौटने का एहसास लायीं।
फिर वही दोस्तों की जमीं महफिलें छोड़ आयी ,
कि फिर वही खामोशी से लिपटी ,
अकेलेपन में समा गयी।
तेरे लौटने की आस में
फिर एक शाम गुजर गयी
फिर वही रात हो गयी,
फिर वही रात हो गयी।।
By Khushbu Sharma

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