Prithvi
By Pooja
गोल है, अनमोल है, पृथ्वी का गजब भूगोल है|
खेती इसपे रेती इसपे न करती कभी ये झोल है॥
इस पर ही मंदिर मस्जिद, इस पर ही बच्चों का टोल है|
नदियाँ टीले झीले जिसपे, वो इसकी ही तो गोद है॥
कहीं हैं बंजर धरती बैठी, कहीं वनों की मौज है।
कहीं हैं हिम के पर्वत इसपे, कहीं ऊंटों के खोज है॥
कोई बनाये इसपे बिल्डिंग, कहीं टूटे झोपड़ी रोज है।
इसकी तो न करे रखवाली, पर नई पृथ्वी की खोज है॥
By Pooja

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