Prakruti ka Rudan
By Harsha Dedhia
रोष से धरती रो पड़ी
फटा अम्बर और सूखे नदी
खाये फल और जलाये वन
गुहार लगाए लाख पर आया न सावन
झुलसती गर्मी में तपा नंगा बदन
कई सपने हो गए भूकंप में दफ़न
हवा तूफ़ान बनकर मिटा गयी हस्तियां
फिर भी न थमी इंसान की मनमर्ज़ियाँ
न भूल की तुम भ्रमांड के तत्वों का हो गठन
पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि और आकाश का हो मिलन
न करो अपने ही पर्यावरण का शोषण
जिसने निस्वार्थ किया है तुम्हारा पालन-पोषण
By Harsha Dedhia

Comments