Poem एक माँ
By Preeti Gupta
एक माँ बूढ़ी हो कर भी
हर दिन नये ख्वाब गढती है
कभी बच्चों के लिए तो
कभी पति के लिए
पर कभी बाबा की नजरों ने उसको
कलाकार नहीं जाना
जबकि खाना बनाने की कला को
माँ ने बखुबी पहचाना
माँ की गढी हर कृति को
मजाक में ही उड़ा डाला
थक हार के आने पर भी मॉं ने
उस थके हारे तन को अपनी
बाहों का सर्वस्व दे डाला
उसकी इस कला को भी कभी
लफ्जों का सहारा ना मिला
कलाकार भी है वो अदाकारा भी है
पर उस मन को समझ के भी कभी
व्यक्त ना कर पाऐ बाबा
और माँ कभी गढ ही नही पाई
ऐसी कोई तस्वीर
जो उतर जाती बाबा के दिल में
या उतरी भी तो उसको खुल के
माँ को बता ही ना पाते
खूबी तो ढूंढ ना पाते
और कमियाँ बेहिसाब गिनवाते
ये रास्ता माँ के दिल तक तो
कभी पहुँच ना पाया
हाँ दोनो ढूंढ ही नही पाऐ रास्ते
जो बने ही नहीं थे शायद
इक दूजे के वास्ते!
By Preeti Gupta

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