Parvaaz - By Arush Singh
- Hashtag Kalakar
- 11 hours ago
- 9 min read
Written By: Arush Singh
Category: Poetry
Competition: Poetry and Creative Writing Competition 2026
Delve into "Parvaaz," a thought-provoking piece by Arush Singh, known by his pen name Parvaz. This entry is part of the Poetry and Creative Writing Competition 2026 hosted by Hashtag Kalakar. Arush's work, rich with introspection and emotional depth, invites readers on a journey through universal themes of struggle, fear, and the human condition. His poetry stands out for its raw honesty and reflective questioning, making it a compelling contribution to this prestigious competition.
About the Work
Arush Singh's "Parvaaz" is a compelling exploration of existential themes, expressed with a poignant and introspective tone. His poetry is imbued with deep emotion and vivid imagery, capturing the essence of human struggles and aspirations. Through a series of reflective questions and thoughtful observations, Arush challenges readers to confront their fears and seek freedom from societal norms. The literary style is both lyrical and profound, inviting readers to ponder over their own lives and beliefs.
Parvaz
Original Submission by Arush Singh
परवाज़ (Parvaaz)
१) आप मर रहे हो
आप मर रहे हो
धीरे धीरे नहीं तेजी से मौत की तरफ बढ़ रहे हो
पलक झपकते ही निकल गया एक भाग जीवन का,
ज्यादा ना संतुष्ट लग रहे हो
थोड़ी बहुत खुद से भी नफरत कर रहे हो
थोड़ी बहुत अपनी चदर भी छोटी कर रहे हो
दस घंटे भी सोके ना जाती थकान
ऐसा लगता नींद में भी जग रहे हो
आखिर क्या है जिससे बच रहे हो?
आखिर क्या है जिससे डर रहे हो?
आखिर क्या है जिससे लड़ रहे हो?
लड़ तो रहे हो?
या मान चुके हार, और कर रहे शायद से अगले जन्म का इंतजार
अपने साथ ये बदसलूकी क्यों कर रहे हो?
आप ना पहले इंसान और ना आखिरी जो गुजरे जिससे आप गुजर रहे हो
तो क्या इतने इंसानो के जीवन को परख के, सही काम कर रहे हो?
कौन सी तलब से आप जुड़ चुके हो?
कौन से बोझ के तले आप दब चुके हो?
कौन से ख्वाब "कल" के बक्से से "काश" के बक्से में रख चुके हो?
कौन से वार सह कर भी आप चुप रहे हो?
कौन सा काम जो बताते कभी नहीं करा पर हजार बार कर चुके हो?
क्या आप वक्त के साथ बदल रहे हो या अपनी एक झलक के साथ ही अटक चुके हो?
नहीं जानता आपकी आस्थाएं क्या पर क्या अब भी खुद में यकीन कर रहे हो?
सलवट वाले कपड़े में अभी भी तन रहे हो, या बिन सलवट के में भी छिप रहे हो?
आखिर क्या कर रहे हो?
थोड़ा जल्दी परखो
क्योंकि आप मर रहे हो
धीरे धीरे नहीं तेजी से मौत की तरफ बढ़ रहे हो
आप मर रहे हो।
२) डर
डर
आखिर होता क्या डर?
आखिर होता क्यों डर?
काम के लायक होता या बोझ होता डर?
कितना डर सेहतमंद और कब जानलेवा होता डर?
आखिर है वो बीच की रेखा किधर?
चलते धंधे डर बेच के
बनती सरकार डर सींच के
बढ़ते धर्म डर रूह में बसा के
मरते सपने हार से डर जा के
समाज के डर से कुछ को लगता घुटके जीना बेहतर
मौत के डर से कुछ को लगता कभी न जीना बेहतर
अंधकार के डर से कुछ को लगता हमेशा परछाई में जीना बेहतर
पर क्या नहीं लगता डर, हो जाएगी भूल हमेशा डर में रहकर?
इंसानी फ़ितरत, ये न कोई सिखाने वाली चीज़
न मामूली दिक़्क़त, पर न ही कोई भूलने वाली चीज़
करता मशक़्क़त ताकि न आए मेरे और मेरे छीने के बीच
इसपे क़ाबू करना होगी शायद सबसे बड़ी जीत
डर जो दे सके लाभ और डर जो बना सके जीवित को कंकाल हैं
उनकी रेखा बारीक आत्मविश्वास और घमंड के धागे की धार से
डर का करता इंसान ग़लत प्रयोग बहुत, न वो देगा पाप और मोक्ष की दूरी जोड़
न मैं बतला सकता वो धारा आपके लिए किधर, करनी वो खुद ही खोज
पर रखना ज़ेहन में कि
आज़ाद वो जिसको न खुदके ख़याल खुदसे सोचने का डर
आज़ाद वो जिसको न भीड़ से अलग दिखने का डर
आज़ाद वो जिसको न सवाल करने का डर
आज़ाद वो जिसको न ग़लत साबित होने का डर
तो परखो... समझो... और बदलो... अपना रिश्ता डर से
३) हमेशा देर कर देता हूँ मैं
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
अपनी दीवारों के बाहर देखना हो,
किसी को चूल्हा देना हो जिसको खाना सेकना हो,
माफ़ी माँगने तक माफ़ी भेजने का आख़िरी किवाड़ भी बंद होने वाला हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं।
अपने फ़ैसलों पे अटल खड़ा होना हो
न सब्र रखा जब सब्र बरतना हो
इंसानो के डर से सबको एक कदम दूर रखा
जब मुखौटा हटाना हो, सामने वाले में वैद्य परखने में
हमेशा देर कर देता हूँ मैं।
४) अम्मा (from poet's father pov)
हैं उसके अनेक नाम- माँ, मम्मी, मम्मा,
मैं बुलाया करता था उसे 'अम्मा'।
'था' इसलिए, क्योंकि उसकी राख तो बहा दी गंगा में,
पर उसको याद किए बिना एक भी दिन ना गुज़रता है।
कहते हैं बच्चे होते हैं माँ का अंश, पर बिछड़ने पे अधिकांश भाग भिन्न हो जाता,
सच कहूँ, जब तेरह वर्ष की आयु में अम्मा का साया सर से छिन जाता,
फिर ना लगती रात खौफनाक, ना लगती मार दर्दनाक,
ना डर लगता साँस रुकने का, और ना लगता डर और किसी का हाथ छूटने का।
नहीं उतर सका यह बस्ता कंधों से,
क्या पता खोल पाऊंगा भी क्या इसी जन्मों में
याद्दाश्त की बीमारी से बहुत डरते हैं,
एक वही है जिससे हम अपना बचपन, अपना घर समझते हैं
था बड़ा कठिन समय, पर दुखड़ा भी किसके आगे रोएँ?
लोरी गाते हुए सर पे हाथ सहलाने वाली चली गई, अब ना लगता अपना कोए।
पिता जी को ना शराब के नशे से फुर्सत थी,
याद नहीं कभी पूछा भी- "बता बेटा, क्या है जीवन में दिक्कत कोए?"
कहा किसी ने- 'समय भर देता है हर ज़ख्म',
नहीं झेला होगा लिखने वाले ने लिखने तक ये ज़ख्म।
छोटी उम्र में जब बच्चे बड़े हो जाते हैं,
फिर क्या ही घोंट पाएगी कोई और घुटन
जब चीखती थी अम्मा दर्द में सारी रात,
अच्छी नींद लिए हो गए थे उसे कई साल,
फिर भी सबसे बड़ी फ़िक्र की थी बात-
"खाना तो खाया? भूखा तो नहीं है मेरा लाल?"
वैसे तो ना मैं ज़्यादा धार्मिक इंसान,
पर अगर सच है कि होता है भगवान,
तो छोटी सी गुज़ारिश है उससे-रखना मेरी अम्मा का ख़्याल,
जैसे रखा था उसने, जब से था मैं एक नन्ही जान।
मिलना होगा अम्मा तुझसे एक दिन,
आज के लिए चाहता हूँ तू जाने- हो गया तेरा लाल कामयाब,
ना अब है चिंता रात में खाएंगे क्या,
और तेरे पोतों को मिला एक ज़िम्मेदार बाप,
खासकर एक मौजूद बाप
करी पूरी कोशिश बन सकूँ ऐसा आदमी जैसा देखा था तूने ख्वाब
भरोसा रखा सोने से भी ज्यादा संभाल कर अपने पास
ना पूछ सका कभी पिता जी से सवाल
एक वक्त के बाद ना जानना चाहता था कोई जवाब
होती मजबूरी इंसान की, कई बार होते खराब हालात
उम्र के साथ कर दिया था मैंने पिता जी को भी माफ़,
रहें वो भी चैन से मेरे साथ अपने बाकी साल,
आशा है तू भी कर पाए उनको किसी दिन माफ़।
मिलना होगा अम्मा तुझसे एक दिन, है मुझे पूरा यक़ीन
आऊँगा भागता हुआ तेरे पास, गले लगूँगा और ना इस बार छोड़ने दूँगा तुझे मेरा साथ पल एक भी
सुनना चाहता हूँ- "खाने में खाएगा क्या मेरा बच्चा आज?"
अम्मा, खाना चाहता हूँ तेरे हाथ के कढ़ी-चावल, सब्ज़ी खट्टी-मीठी कच्चे आम की,
निवाला खिलाने वाला भी हो तेरा हाथ
सुनना चाहता हूँ तेरी मीठी आवाज़ में 'रामचरितमानस' एक और बार,
हँसना चाहता हूँ तेरे साथ एक और बार,
रोना चाहता हूँ तेरे साथ एक और बार,
रहना चाहता हूँ तेरे साथ एक और बार।
अम्मा, तेरी आज भी आती है बहुत याद...
अम्मा, तेरी आज भी आती है बहुत याद…
५) कैसे
सारी जिंदगी सोचा कि खो चुके खुदको कबके
ना मिला अपना संसार, खोज चुके जग थे
जब हटाई धूल पुरानी किताबों से
तो शब्द कागज में ना सारे मिल चुके थे
जब लगा तट है नजरों में
तब तक शक के बादल राह ढक चुके थे
दीवारें तस्वीर में कैद यादों के इंतजार में बूढ़ी हो गईं पर सुनी ही रहीं
कलम ने कागज पे स्याही पूरी रो दी पर चिट्ठी पूरी ना हुई, अधूरी ही रही
काँच टूटने पर, कलाकार ने कोशिश पूरी तो करी पर टुकड़ों में दूरी ही रही
जब शाम ढली तो तारे दिखे, उजाला अनजाने में ना देता तारों की खूबसूरती चमकने,
या फिर अंधकार जरूरी होता तारा बनने, भला क्या है सही
जीवन ना लगती पहेली जब जीवन का मतलब समझते
लेकिन होता मतलब सबके लिए अलग, मेरे लिए सही कौन सा मतलब, कैसे समझते
सुना मिलती शांति बहुत समझने पे, जिसने ना देखी कभी शांति, उसको करती वो भी अशांत,
तो भला कैसे शांति परखते?
तो भला कैसे खुद से मिलते?
६)क्यों
न किसी पे प्रहार बस समझना चाहता इंसान की गणित में
न मेरे कदम किसी के पदचिह्नों पे, तो संभावनाएँ अमित हैं।
संसार त्यागने तक न चाहता संसार से भागना, बस बाद में रह जाना चाहता-कि क्या समझे कवि थे।
बदलते समाज की सीमा वो जो सवाल करते, जिसको परम-सत्य मान बैठे लोग उस सदी के।
तो
क्यों मानूँ मैं ऊपरवाले में?
नरक के ख़ौफ में या स्वर्ग की लालच में
अलग न दिखूँ इस दौड़ में
या "भगवान के रक्षक" मेरा सर न फोड़ दें
ख़ैर कुछ तो चाहते बस मन की शांति, लगता ऐसा जैसे कोई देख रहा अपना
दिल होता हल्का, एक भजन कर देता जो न कर पाता विपश्यना एक महीना
पर सवाल फिर भी कि, मन की शांति के लिए क्यों ज़रूरी है इतना सब कुछ साथ में जुड़ना
मन की शांति तो मिलती चाहिए मन से? इसमें कैसा "सही तरीका", इसमें भी नियम क्यों है दुखता?
नहीं समझ पाया चलता कर्म का पहिया ऐसे क्यों,
एक भ्रष्टाचारी बलात्कारी नेता का दंड भोगेगी एक 10 साल की अज्ञात मासूम जान
ये न हो सकता कभी मेरी नज़र में इंसाफ़
मैंने किए कर्म आज, मिलना चाहिए मुझे उसका दंड या फल आज
ये दूसरे जन्मों में बात टालने का क्या मतलब, भगवान कब से लगा करने काम टाल?
वो तो थी भक्त क्यों नहीं बचाने आए?
तब बचाव में बोलते "फ़्री विल" होती भाई
और है अगर फ़्री विल तो पूजते किस बात का?
और न पूजने पे चढ़ेगा पाप किस बात का?
शायद इंसानों में भगवान खोजने की जगह खोज लिया भगवान में इंसान
कहते 'भगवान से डरो' अगर डर जैसी चीज़ अब भी मेरे अंदर तो वो किस बात का महान
वो है योगी या शासक, सच है या लालच, चाहता ग़ुलामी या आधार, भक्ति है या सौदा जनाब
मेरे पास न कोई हाज़िर जवाब, पर जानता सच का रास्ता "सवाल"
तो सवाल वही क्यों मानते हो "इस तरह" के भगवान में?
तो सवाल वही क्यों तौलते हो खुदको किसी और के बनाये तराज़ू में?
कभी शांति से पूछके देखना अपने आप से, जब न हो किसी के क़ाबू में
मैं आज़ाद न सिर्फ़ बातों से, बल्कि ख़यालों से, साँस मेरी,
है साहस मेरा, समझ मेरी, और कर्म का फल भी मेरा
गुनाह का दंड भी मेरा, और किसी को दिया हुआ वचन भी मेरा
मेरे मुँह से निकला हर अलफ़ाज़ भी मेरा, मुझे करना क्या उसका कथन भी मेरा
तो चाहता मैं एक सवाल आपसे पूछना क्या आप वाक़ई में आज़ाद हैं?
या पता भी नहीं गुनाह क्या और अदृश्य बेड़ियों में बँधे लाचार हैं?
और मैं चाहता आप भी अपने आप से पूछें कुछ सवाल
कि
क्यों मानूँ मैं बिना कुछ खुद से जानने?
क्यों मानूँ मैं बिना कुछ खुद से पहचानने?
ये असुविधाजनक सवाल करने वाला ही असल बलवान है
क्या आप बलवान हैं?
वो कहते हैं न चुपचाप करती सबसे ज़्यादा शोर, समझो कुछ ऐसा समाज की तलवार की पैनी करनी धार की चाह बढ़ती गयी उम्र के साथ ही
नहीं मिले शायद जवाब आज भी, पर बढ़ गयी क्षमता करने सवाल की
तो क्यों मानूँ मैं ऊपरवाले में?
सवाल ग़लत है
पहले पूछना चाहिए कौन बैठा है नक़ाब में ऊपरवाले के?
७)बेहतर कल
खोला पिंजरा पंछी किया आज़ाद क़ैद से
पर पर न खुले, जानता अब रहना सिर्फ़ क़ैद में
उड़ने की उम्र में लगा दी जब उड़ान पे लगाम
अब ग़लती निकाले पंछी की क्यों रहता इतना सहम के
सही मौक़े की तलाश में, सारे मौक़े गवाँ चुका
महीनों से हताश मैं, सपनों पे कोहरा छा चुका
न चाहिए कोई करे अहसान, बस कोई जो करे भरोसा
न भुलाना चाहता अपना बीता कल, अपनाना चाहता वो मुझे करेगा सफल
तरस खाने को नहीं चाहिए एक और जना
न और सुनना कि बेचारा बड़ा
न डरता हारने से, पर सच में थक गया हारने से
अब जीतना चाहता, हार में सीख तलाशने से
आज भी मैं हर रोज़ की तरह सुबह उठा, पर आज वर्षों बाद सवेरा हुआ है
नहीं पता "कितना", "कब", "कैसे" पर चलो वर्षों बाद "क्या" और "क्यों" पता है
आज मुझे बालकनी की सीलन नहीं खटकी, इसी बहाने वर्षों बाद किसी का हिचकी लेना बंद हुआ है
आज न ग़ौर है मेरा छोटी-छोटी बातों पर क्योंकि वर्षों बाद सपना बड़ा दिखा है, खुद से वादा पक्का किया है
आशा है लाऊ, मैं एक बेहतर कल
देख पाऊँ, अपनी आँख में आँख डाल कर
उठते ही न करने लागूँ, इंतज़ार आएगी रात कब...
न स्वीकारना चाहता मेरा "मैं",
सच कहूँ तो चाहिए मदद
८)मेरे मरने पर
मेरे मरने पर मेरे शरीर को जानवरों के पास छोड़ देना या विज्ञान के हाथ सौंप देना,
गलती से कब्र या राख में न तौल देना।
न मानता किसी धर्म में, अगर कोई पूछे मेरा धर्म क्या
तो ज़िम्मेदार बोल देना।
मेरे मरने पर मेरी कलम तोड़ देना,
वो शब्द जो मेरी आवाज़ दबा देते उनको आज़ाद छोड़ देना।
मेरे मरने पर चाहे भोग न देना पर कविताएँ चार बोल लेना,
तारीफ़ के नाम पे मुझे एक इंसान बोल देना।
मेरे मरने पर मेरी कहानियाँ एक बार देख लेना,
हो सके तो उनसे कुछ सीख लेना और मुझे कामयाब बोल देना।
About the Competition
The Poetry and Creative Writing Competition 2026 by Hashtag Kalakar celebrates the rich tapestry of creative expression. This platform provides writers with an opportunity to showcase their unique voices and explore diverse themes. While the competition highlights the talents of participants from around the globe, it remains a celebration of creativity, offering a space for emerging and established writers to engage with a wider audience.
We extend our heartfelt thanks to Arush Singh for sharing his evocative piece "Parvaaz" with us. His contribution to the Poetry and Creative Writing Competition 2026 adds a significant depth to the array of works featured this year. We appreciate his participation and look forward to seeing how his poetic voice continues to evolve.
About Hashtag Kalakar
Hashtag Kalakar is a creative platform dedicated to providing artists, writers, singers and other creative talents with opportunities to showcase their work and reach wider audiences through competitions, features and creative initiatives.




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