Nit Rann Mein Utrungi...
By Vinayak Pratap Singh
नियती का अपनी है ज्ञान किसे
आकाश की उंचाई का है अनुमान किसे
फिर भी हूँ दिल में मैं प्रण लिए
नित रण में उतरूंगी विजयतिलक के लिए
माना कि है पथ दुर्गम समक्ष
माना कि परिस्थितियाँ हैं नहीं मेरे पक्ष
तो हूँ मैं भी तैयार
करने चुनौतियों पर प्रहार
हूँ दिल में प्रण लिए
नित रण में उतरूंगी विजयतिलक के लिए
माना कि निराशाओं ने है दामन पकड़ा
मान कि आशाओं पर लग गया है पहरा
पर समय अब वह भी आ गया है
बनने जा रही मैं सफलता का एक नया चेहरा
हूँ दिल में प्रण लिए
नित रण में उतरूंगी विजयतिलक के लिए
माना कि दुनिआ की किताबों में
दुर्बल ही लिखा है स्त्री की पंक्तिओं में
पर लिखे हुए को ही मिटाने
तो दिया है माँ ने ये जन्म मुझे
हूँ दिल में प्रण लिए
नित रण में उतरूंगी विजयतिलक के लिए
माना की बहुतों की नज़रों में
काबिलियत बहुत नहीं है मुझमें
पर धृतराष्ट्र जैसी इन नजरों को
बदल दूंगी मैं पहनकर विजय मुकुट को
हूँ दिल में प्रण लिए
नित रण में उतरूंगी विजयतिलक के लिए
संघर्ष तो जीवन पर्यंत का हिस्सा है
जीवन के हर पल में इसका एक अहम किस्सा है
निखरूँगी मैं करके श्रृंगार
संघर्षो से बने ताज और तलवार
हूँ दिल में प्रण लिए
नितरणमेंउतरूंगीविजयतिलककेलिए
By Vinayak Pratap Singh

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