Nih-Shabad
By Ritu Sachdeva
ज़ख्म इतने दफ़न कर लिए है अंदर…
कि हर बार लगता है, औरों की जगह नही;
पर फिर-फिर आ जाते है रूप बादल कर…
और कहते है तैयारी कर ले औरों के आने की!
बेचारे जाए भी कहाँ?
इनके लिए दरवाज़ा कोई खोलता ही नहीं!
फरियाद करते है मुझसे… नि:शब्द होकर,
कि पनाह दे दो हमें थोड़ी…
कोई और हमें रखता ही नहीं!!
By Ritu Sachdeva

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