Nazare Bolti Hai
By Srishti Kyal
चुप है जुबां पर, नजरें बोलती हैं,
इस दिल के सारे राज़ खोलती है,
परवाह ना करूं तो, झलकती नाराजगी
करूं परवाह तो बेचैन हो उठती हैं,
चुप है जुबा मगर, नज़र बोलती है।।
मेरी हंसी पर ठहर जाती उसकी नजरें,
मेरी खूबसूरती के उनमें होते चर्चे।
कहता मुझे, है तुझे गलतफहमी बड़ी,
फिर क्यों नजरें उसकी ढूंढे मुझे हर घड़ी।
चुप है जुबा मगर नजरें बोलती है।।
चोरी चोरी देखे मुझे,
इजहार कभी न करें,
आंखें हर पल सराहे मुझे,
फिर क्यों दोस्ती का दम भरे।
चुप है जुबा नजरें बोलती है।।
नैनों में उसके जब भी झांकू मैं,
अपनी ही छवि उनमें पाऊं मैं,
एक पल जो, ओझल हो जाऊं मैं,
आंखों में घबराहट नजर आती है।
क्यों चुप है जुबा, जब नजरे सब बोलती है?।
By Srishti Kyal

Comments