Nav Vadhu
By Aryasilpa Das Adhikari
सास की बांग नहीं
गोकुल के दरवाज़े की घंटी सुन नींद खुली
अगले ही कुछ पल में
सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना
और रात की चार रोटी बानी।
तेज तेज से कुछ व्यायाम कर, बिस्तर के वगल में
आँखें मूंदे, लम्बी लम्बी साँसें भरी, पंखे के पहल मे।
पास के बाग़ की ठंडी हवा
और दूर के सूरज का उस्म किरण
कर रहे थे गृह प्रवेश
मेरे छोटे से किराये के महल मे।
इतने में,
याद आया एक ज़रूरी दफ्तर का काम
भाग गए फुर्सत के पल तमाम।
जल्दी से, खुली मोहरी की
पैंट कोट का जोड़ा पहना
गाड़ी में बैठ,
कप्म्यूटर में कुछ काम थामा।
भागी मैं दफ्तर के अंदर
कांच के कमरे में बैठ
अपना चूल्हा चौका जमाया |
पूरे दिन के काम की सूचि बनायीं
बैठक, चर्चा, विमर्श, विवाद और
कभी भिड़ंत कर
अपनी जगह और सम्मान जोड़ा।
दहेज़ में लायी
शीतलता, क्रोध, धैर्य , दृढ़ता और ठवन
को लेकर
आदमियों से भरे कमरे में
अपने लिए ढट्ट के लड़ी
और
मुझ जैसे हज़ारों के लिए
दम्भ से रही खड़ी।
ना संकोच, ना लज्जा
ना भय है , ना है कोई साज सज्जा
हर दिन मुझे पिरोना है मधु
मैं हूँ आज की नव वधु।
By Aryasilpa Das Adhikari

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