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Mushaira 7

Dec 1, 2025
1 min read

By Manas Saxena


अँधेरों के साए में छुपी है एक कहानी है 

किताबों के बोझ तले रोती ये जवानी है 

अब तो चाँद भी रोता है अब्र-ए-बहार के किनारे, 

दिल के ज़ख्म छुपते हैं राज़ के पर्दों के सहारे।


जिंदगी के रंग हैं बस सियाह और सफेद, 

खुशी के सपने बन गए फर्जी से एक खेल। 

मिट्टी में घुलती है अब तो हर एक पहचान, 

अब क्या रखें याद हुजूर, 

जब सब कुछ लगता है बेजान।


तन्हाई के साये हर मोड़ पर मिलते हैं, 

अपनों के चेहरे भी तो अब बेगाने से लगते हैं। 

साँसें तो ले रहे हैं बस एक आदत की तरह, 

जीने की वजह भी अब बेगानो से पूछते हैं 

क्योंकि

वैसे तो जीने के बहाने भी हज़ार मिलते हैं ||


By Manas Saxena


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