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Mushaira 10

By Manas Saxena


लहू था जिगर का ये आंसू नहीं थे,

बहाए न जाते तो हरगिज़ न बहते |


नशेमन ना जलता निशानी तो रहती,

हमारा क्या था ठीक रहते ना रहते |


ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था, 

खुद ही सोगये दास्तां कहते कहते |


कोई नक्श कोई दीवार ना समझा,

ज़माना हुआ हमें चुप रहते रहते |


डूबना था मेरी किस्मत मैं बहरहाल

तुम मुझे एक बार पुकार तो लेते |


By Manas Saxena


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