Mushaira 10
- Hashtag Kalakar
- Dec 1, 2025
- 1 min read
By Manas Saxena
लहू था जिगर का ये आंसू नहीं थे,
बहाए न जाते तो हरगिज़ न बहते |
नशेमन ना जलता निशानी तो रहती,
हमारा क्या था ठीक रहते ना रहते |
ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था,
खुद ही सोगये दास्तां कहते कहते |
कोई नक्श कोई दीवार ना समझा,
ज़माना हुआ हमें चुप रहते रहते |
डूबना था मेरी किस्मत मैं बहरहाल
तुम मुझे एक बार पुकार तो लेते |
By Manas Saxena




Comments