Muntazir Rehte Hai
By Mohammad Imran Khan
वो कहते थे हमसे बहुत अच्छे इंसान हो l
उनकी बात पर हम इंसान बने फिरते हैं ll
वो कहते हैं अब हम दोस्त भी नहीं हैं l
हम अपने दिल में इश्क़ लिए फिरते हैं ll
उनकी बेरुखी देख कर दिल तड़पता है l
हम उनके लिए हथेली पे जान लिए फिरते है ll
कब तक रहेंगे वो नाराज़ नहीं पता l
हम उनसे बात के लिए दिन-रात तड़पते हैं ll
क्यों हो गई बातें ख़त्म उनसे l
हम अपने दिल में ये सवाल लिए फिरते हैं ll
उन्होंने की हमसे सख़्त लहजे में बात l
हम उनसे बात के लिए अपना लहजा नरम रखते हैं ll
वो करते हैं गैरों से मुस्कुराते हुए बात l
हम अपनी मुस्कराहट तलाश करते हैं ll
नहीं मिलेगा हमको उनसा दोस्त कोई l
हम उनकी तलाश में दर-बदर भटकते हैं ll
वो ऐसे तो ना थे जो बदल गए l
हम उनके बदलने का इंतेज़ार करते हैं ll
अब नहीं होगी मुलाकात उनसे कभी l
ये जानते हुए भी ‘मुन्तज़िर’ रहते हैं ll
By Mohammad Imran Khan

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