Meri Zindagi
Updated: Jul 11, 2025
By Pratiksha Singh
आज ज़िंदगी से मुलाकात हुई
कुछ परेशान सी वह थी शायद
कुछ नाराज़गी मुझसे भी
कुछ खुदसे खफा भी थी शायद
वह कहना बहुत कुछ चाहती थी
पर वक्त की कमी भी थी शायद।
आलम भी कुछ ऐसा था
वह चुप्पी ओढ़े बैठी थी
अरमानों की कितनी लाशे
बाहों में लिए वह बैठी थी
आंखों में कितने ही ख्वाब
दम तोड़ने जा रहे थे
पर ज़िंदगी मेरी होठों पर
मुस्कान सजाए बैठी थी।
तकदीर ने उसका साथ छोड़
मानो किनारा सा कर रखा था
हाथों की लकीरों ने भी
ना बदलने का इरादा कर रखा था
लड़ी वह उनसे बहुत मगर
अब हिम्मत टूटने लगी थी
फिर भी जाने क्यों कोशिश अपनी
जारी उसने रखी थी।
खामोशी तो अब भी थी
पर अब वह कहना चाहती थी
बाहों में बिखर गई वो
बोली मैं रोना चाहती थी
के बस शोर नहीं था मन में उसके
वह कोहराम छुपाए बैठी थी।
आज खोलकर दरवाज़े वह मन के
दिल खाली करना वाली थी
खुदके बारे में आज वह
खुदसे कहने वाली थी
बातें अभी चली ही थी की
सांसों की डोरी टूट गई
हाथों में मेरे मेरी ज़िंदगी
अपनी ज़िंदगी छोड़ गई।
By Pratiksha Singh

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