Marm-E-Zindagi
Updated: Jan 12, 2023
By Priyanka Dubey
ग़र्दिश के दिनों में, टूटे हौसलों के साथ,
जुगनुओ की टिमटिमाती रौशनी में,
निकल पड़ा एक अनजान राह पर,
ज़िंदगी की खोज में,
कोई नहीं था साथ मेरे,
कोई नहीं था पास मेरे,
बस अक़्स मेरा और रौशनी जुगनुओ की,
जो कह रही थी कि,
“स्याह काली रात की ताक़त भी मेरे हौसलों के आगे कुछ नहीं,
ग़र दिल में हो जज़्बा और नीयत तो कुछ भी मुश्क़िल नहीं”,
उस मर्म एहसास ने टूटे हौसलों से उबारा मुझे,
उस स्याह क़ाली रात ने और तेज़ कर दी मेरी आँखों की रौशनी,
दिया हुनर मुझे अँधेरे में देखने और सम्हलने का,
ग़र्दिश की स्याह रात भी अब मुझसे अपने पैमाने पूछती है,
क्या और स्याह होने की गुंजाइश है?
जब मुस्कराता हूँ मै तो और खीज सी जाती है,
ज़िंदगी की राह अनजान ही सही पर,
अब हुनर है मेरे पास, इसके हर मोड़ को खूबसूरत बनाने का,
एक पल है ज़िंदगी, और हर पल में है ज़िंदगी,
हर मोड़ पर है ज़िन्दगी, हर कदम पर है ज़िंदगी,
बस फैसला मेरे हाथों में है कि खोज ली है "मै" ने ज़िंदगी या खो दी है ज़िंदगी!
By Priyanka Dubey

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