Margdarshak
By Harshit Mishra
सकल समर के बीच जब शत्रु खड़ा हो सामने,
चाइये कोई कृष्णा सा जो अर्जुन के रथ को थम ले
न होने दे डगमग धैर्य को
न होने दे विचलित कदा भी मन को
न होने दे पार्थ के गांडीव को उससे अलग
न होने डे पार्थ को आशाओ के किरणों से अलग
कब रिपु दमन कब रहना है मौन ये उसके बतलाते रहे
धर्म अधर्म के बिच अंतर् उसको समझाते रहे
सदैव आगे बढ़ने को प्रेरित उसे करते रहे
और उसकी गलतियों का असहास भी करवाते रहे
दुर्योधन - अर्जुन के मध्य अंतर् इतना ही रहा
एक के संग थे हरी दूसरे के संग थी कुटिलता जुडी
एक के रथ पर ब्रह्मण्ड पूरा डोलता था
दूसरे के खेमे में षड़यंत्र रचने वाला ही बोलता था
और अंत में हुआ वही जिसका सबको पता था
भूशाही हुआ दुर्योधन जिसके मन में अधर्म रचा पड़ा था
और जीत गया अर्जुन जो कृष्ण के मार्गदर्शन पर अड़ा खड़ा था
By Harshit Mishra

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