Mardaani
By Nikita Gupta
ऐ औरत, उठ खड़ी हो
जगा अपने अंदर की मर्दानी को ।
भले ही ये पुरुष प्रधान समाज हो
तुझसे ही तो जनमा है, रावण हो या राम हो ।
तू क्यूँ इतनी बेहाल है
यह अस्तित्व पर तेरे सवाल है ।
औरत होना कमज़ोरी नहीं, ये तो तेरी ढ़ाल है
तुझमें असीम शक्ति, के बन सके तू हर बुराई का काल है ।
यह हिम्मत तेरी का अंत नहीं, पर प्रारंभ है
तू ही तो दुनिया का अटल, अटूट स्तंभ है ।
तू ही जग की आन, तुझसे ही जग की शान है
अंबा, जगदंबा, काली, सब तेरे ही तो नाम हैं ।
ये जो बाँधे तुझे रिश्तों की दुहाई देकर
जिन पर तू न्योच्छयावर करदे अपना सब कुछ, उनकी बलाई लेकर।
तेरी दुनिया को ये सीमित रखें, घूंघट की ओट में
रिवायतों के नाम पे, तेरे अक्स को चोट दें।
तेरी नजाकत से निखरता तेरा नूर है
तेरी रूहानियत तेरा गुरूर है।
खुद से खुद की तेरी मुसलसल जुस्तजू
फितूर नहीं, ये है तेरी शख़्सियत को तराशती खुदा से गुफ्तगू।
सहर से शाम, फिर शाम से भोर तक
रहनुमा बनकर, पहुँचाये तू जीवन के छोर तक।
कभी ना थमती तेरी जद्दोजहद
प्यार और ममता की मूरत है तू बेहद।
कभी जो मासूम से, तेरे आँचल में सिमटते थे
आज वही उस आँचल को खींच रहे।
दिखा दे उन हैवानों को तेरी ताकत
कि तू ही है, भगवान की सच्ची इनायत।
ऐ औरत, उठ खड़ी हो
जगा अपने अंदर की मर्दानी को ।
By Nikita Gupta

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