Manav Ki Mati Kuposhit Hai
By Jwala
मानव की मति कुपोषित है
कलम आज मेरी आक्रोशित है
जल रही घृणा की उग्र अनल¹ में
धरती का फटना अब घोषित है
मानव के मति कुपोषित है,
कलम आज मेरी आक्रोशित है
चहुँओर द्वेष का गरल² सिन्धु
औ' कश्ती मेरी कलम बनी है
कैसे मैं प्रेम के गीत लिखूं, जब
हर गर्दन पर शमसीर तनी है
यहाँ चोर-लुटेरे कोतवाल
जो लुटा वही आरोपित है
मानव की मति कुपोषित है,
कलम आज मेरी आक्रोशित है
राम यहाँ भगवान् तो हैं
पर केवट-शबरी का मान नहीं
सरदार भगत का बस नाम बचा
बातों का उनकी ध्यान नहीं
गांधी को गाली बकें यहाँ , पर
नाथू का नाम शुशोभित है
मानव की मति कुपोषित है,
कलम आज मेरी आक्रोशित है
यहाँ महादेव और अल्लाह की
छत्तीस की बाजी चलती है
वो सोच रहे होंगे बैठे
इंसान बनाना ही गलती है
यहाँ दादरी की गलियों में
अख़लाक़ की हत्या 'देशहित' है
मानव की मति कुपोषित है,
कलम आज मेरी आक्रोशित है
कश्मीर के पंडित औ' चौरासी के
सिक्खों यहाँ कुछ पता नहीं
बंट गये हिंदु-सिख-मुसलिम में
इंसान यहाँ कोई बचा नहीं
अब हवा-पानी की क्या बोलें, जब
सबका मन ही यहाँ प्रदूषित है
मानव की मति कुपोषित है,
कलम आज मेरी आक्रोशित है
जल रही घृणा की उग्र अनल में
धरती का फटना अब घोषित है
धरती का फटना अब घोषित है
By Jwala

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