Majdoor
By Himanshu Sahwal
दिनभर के श्रम के बाद भी, रात भर जिसने जगाया था;
वह कोई शख्स या मौसम नहीं,
महज़ गरीबी नमक बिमारी से जन्मी, भूख का एक लक्षण था।
स्तिथि चाहे जैसी हो, उस गरीब का एक ही रोना था;
की बस मिल जाए एक वक्त की रोटी, क्यूंकि अपने बच्चों की भूख से तड़पती आंखों का दर्द,उसे अब और नहीं ढोना था।
इस गरीब का क्या धर्म,क्या ईमान;
भूख ने जिसे तड़पाया था,
ईद की सैंवई हो,या दिवाली की मिठाई;
उसे तो जनाब,दोनो ने ही ललचाया था।
जिन महलों से निकला जूठन,
इन गरीबों का भोजन था,
सोचने पर हुआ आज मैं भी मजबूर,क्या उनके पास,
यही एक आखरी परियोजन था?
By Himanshu Sahwal

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