Mai Aur Mithya
Updated: Dec 5, 2022
By Srishti Pandey
मुझे सब समझ आता है क्योंकि ज्ञान सिर्फ वहाँ तक है जहाँ मैं खड़ी हूं । जहाँ तुम शुरू होते हो मैं डगमगा जाती हूं
।
जो ख़ुद को मेरे बुनियादों के घेरे में लथेड़ता नहीं है,मैं उन्हें कुचल देती हूं ।
मेरे हिसाब से इंसान सिर्फ़ उतना है जितना आंखों को दिखाई दे। जीवन सिर्फ उतना है जो आंसुओं में नापा जा
सके और जिन बातों पर रोना न आया हो वो....?
वो पन्नों पर दर्ज़ होने योग्य नहीं ।
मैंने जिया है एक तरह के दर्द को दूसरी तरह को फर्जी मानती हूं ।
जो मुझे महसूस न हो भ्रम है क्योंकि मेरा दावा है कि मैंने अपनी दो घंटे की ज़िंदगी में सारे पहाड़ और खाई देख
लिए है, इसीलिए दूसरों के सफर को जाली कहने का हक रखती हूं ।
मैंने बहुत मेहनत की है और मेहनत की सीमा मैं हूं ।
मैं इंद्री तृप्तियों में नहीं जीती…. जहां तक हो सके ।
पर जो मेरी इन्द्रियों ने आज तक कैद न किया हो उन्हें घटना नहीं मानती।
ऐसा नहीं मैं तुम्हें जानने की कोशिश नहीं करती पर तुम्हारे जज़्बातों की तीव्रता पचा नहीं पाती।
मैं तुम्हारे आंसु देखकर अनदेखा कर सकती हूं पर भगवान की मूर्ति के भाव में डूब जाती हूं ।
मुझे बेज़ुबनों की भाषा पढ़नी आती है, ज़ुबान वालों की आवाज़ मन में चुभती है ।
मैं अपनी सीमाएं छोड़ चुकी हूं , तुम्हारी आज़ादी को बेड़ियों में जकड़ती हूं।
मैंने पूरी दुनिया समझ ली है,तुम आकाश हो तुमसे नफ़रत करती हूं ।।
By Srishti Pandey

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