Mahamari
By Ankit Samariya
इक्कस्वी सदी का इक्कीसवा साल था जनाब
ऐसा भयानक मंजर न आया किसी के ख्वाब
न बिस्तर थे भरपूर और सांसें हो रही थी चूर
सांसों का तो जी हो रहा था कारोबार
किसी ने बनाए लाख तो कइयों ने हजार
खर्चने को तैयार सभी फिर भी न सांस मिली
किसी ने खोया भाई तो किसी ने बेटे की खुशी
कइयों के ऊपर से हट गया मां बाप का साया
या यूं कहूं की जमीन-ए-जन्नत को हैं खोया
उभरें नहीं है अबतक वो बदकिस्मत इस आलम से
कर रहें है इंतजार, सोचते है लौट आएंगे वापस से
रह रहे है अभी भी अपनो की ही खातिर
वरना एतराज नहीं गर रुक जाएं वो सांसें
मेरी बस एक ही शिकायत है उस से
बनाया जिसने खुद हम सबको, रचा भविष्य भी हमारा
ये भेद-भाव डाला काहे हो, बना क्यों नहीं सबका सहारा
एक जैसा मानता है तू सबको? मुझे कतई न है ये गवारा
तू है भी या नही? है तो उसे बचाने क्यों नही आया ?
By Ankit Samariya

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