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Lock Down Ka Brahm

Apr 29, 2023
1 min read

By Srishti Kyal


घंटी की आवाज से

रोज सुबह उठते थे।

मम्मी की डांट से,

जब हम चिड़ते थे।

मासी का वो चिल्लाना

शरबत रखा है पी जाना।

नाश्ते को मेज पर सजाना,

साथ बैठकर भी अलग खाना।

टॉयलेट के लिए होती लड़ाई,

सबको जल्दी मची है भाई । ।


पर अब सन्नाटा छाया है,

ना घंटी का शोरगुल है,

ना मासी ने बुलाया है।

आज मा रही पुकार,

उठ, करने हैं काम हजार ।

झाड़ू पोछा करने के बाद,

भोजन सब करेंगे साथ।

ना टॉयलेट की हो रही लड़ाई,

बस बर्तनों की करनी है सफाई।।



लॉकडाउन के इस दौर में,

सजी कई खट्टी मीठी यादें,

अपनों से की मन की बातें।

इस स्तब्धता में अब,

गूंजते हैं वही शब्द।

फिर कहीं से आ रही आवाज,

फिर छिड़ा घंटी का साज।

लॉकडाउन समाप्ति का विचार,

करता है विचित्र प्रहार ।।


मन है असमंजस में आज,

जब सुनी डिंग डांग की आवाज।

कर्म से शरीर का टूटा संबंध,

दरवाजे की ओर ना बढ़े कदम।

आई जब दूसरी बार पुकार

स्वयं बढ़ चले कदम,

खोलने, जैसे बरसों से बंद द्वार।

खामोशी थी इधर भी, खामोशी उधर भी

ये मेरा भ्रम था कोई, या तीव्र आशा मेरे मनकी।।


By Srishti Kyal



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