Kyun Yeh Raatein
By Parul
ये जो भाग रहे थे हम यूहीं बेहिसाब कहीं,
खींच लगाम ऊपरवाले ने रफ्तार रोक दी ।
रुक गए हो तो सोचना जरूर
किस बात का था हमें इतना गुरूर,
के ना कीमत समझी कायनात की,
ना हैसियत समझी इंसानियत की,
पहले सब दुश्मन थे घर के बाहर,
अब खुद दुश्मन है घर के अंदर,
ये जो तोल रहे थे हम बरसो का सामान यूहीं
खर्च हो जाएगा हमारे जीते जी यहीं ।
जान से अजीज जानलेवा हो गए है अब।
खुदा कसम बड़े लापरवाह ही गए थे सब ।
जिन आंकड़ों के पीछे भाग रहा था ये जहां,
उन्हीं आंकड़ों में इंसान बिछे पड़े है अब यहां,
तौबा है खुदा दुहाई है
इतनी तो ज़मीं नसीब नहीं जितनी लाशे बिछाई है।
अब भी जरूरत लगे तुम्हे सीख लेने की ,
तो वही संस्कार याद करो जो दादी नानी ने सिखाई है ।
उम्मीद है हम अब सब सही से होगा,
उम्मीद है इंसान मिट्टी की कीमत समझेगा ।
कोशिश है कि कोई यूहीं ही नहीं मरेगा,
इंसान तो इंसान अब आदम जानवर की भी इज्जत करेगा ।
उम्मीद है, और उम्मीद पर दुनिया कायम है ।
By Parul

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