Kya Dekhu..
By Sonika Yadav
ख़्वाहिशें देखूँ के ज़माने वाले देखूँ ,
मंजिल देखूँ के पाँव के छाले देखूँ ,
चाँद भी छुपकर-छुपकर निकलता है आजकल ,
कैसे तुझे चाँद के बहाने देखूँ ..।
बेरंग हुई जाती है शाम-ए-उम्मीद मेरी ,
चराग़-ए-रहगुज़र देखूँ कभी आस्ताने देखूँ ।
By Sonika Yadav

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