Kuch Kahne Do
By Pooja
आज मेरी आँखों के खारे सागर को बहने दो |
शायद कोई समझे, इन आँखों को कुछ कहने दो ॥
अब हकीकत वाले मरे हाल में रहने दो |
मौन हु पर मुझे दिल से कुछ कहने दो ॥
बिन सावन बरसी आँखे, इन्हें भीगा ही रहने दो |
थोड़ा ही सही, लेकिन कुछ मुझको भी सहने दो ॥
समय तगाजा करता, लेकिन उसे घड़ियों में रहने दो ।
कल काल कौन सा आए अब आज को तो आने दो ॥
हम आदि हैं झोपड़ी के उन्हें महलों में रहने दो |
हम खोदते हैं रोज खजाने उन्हें गहनों में रहने दो ॥
हमें मिली चिता ना लकड़ी की उन्हें सोने के पलंग सोने दो ।
हम आए लावारिस थे और अब भी हैं उन्हें अपनों में रहने दो ॥
मेरी हरियाली में सूखे गुलशन उन्हे बंजर में लिखने दो |
बिन प्यास पिलाओ अमृत उनकों हमें प्यासा ही रहने दो ॥
हम कही कहे न कुछ भी इस कलम को तो कहने दो ।
कुछदिनइसबेगानीकायामेंमुझकोरहनेदो॥
By Pooja

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