Koshish
Updated: Sep 16, 2025
By Ishaan Arya
मेरा घर था उस गांव में ,
दिल में धुंधला सा बसता है ।
कुछ यादें उसकी ताज़ा हैं
आँखों में अब भी सजता है ।
एक चूल्हा था उसके आंगन में
शाम की लाली वहां धुंए में सिकती थी ।
वो दूर हरे खेतों की ठंडक
मन को खूब सुकून देती थी ।
दादी के हाथ का रोटी का चूरमा
ज़िन्दगी में मिश्री घोल देता था ।
घंटों तक चारपाई पर बैठकर
धूप में लम्बी बातों से मन सिकता था।
रात में सितारों की छाँव का सुकून
हर परेशानियों में आशा देता था ।
अब वो दिन कहाँ वो रात कहाँ , समय वो सुन्दर बीत गया,
शहरों की चकाचौंध में आँखों से वो सब रूठ गया,
मेरा गांव का वो सुन्दर आंगन, कब का पीछे छूट गया ,
मेरा गांव का वो सुन्दर आंगन, कब का पीछे छूट गया ।।
By Ishaan Arya

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