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Kis Baat Ka Darr

May 8, 2023
3 min read

By Parul


किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो ।

ये हिन्दू - मुस्लिम किसे सीखा रहे हो ।

मेरे पुरखों ने जोता है इस धरती को,

तुम किसान होना किसे बता रहे हो ।

किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो ।


गर मांस कोई खाता है,

तो बली तुम भी चढ़ा रहे हो ।

कामचोरी ,भ्रष्ट आचरण ही स्तंभ है तुम्हारे,

मुझे क्या करना है ये मुझे क्यों सीखा रहे हो।

किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो ।


तुमने कहा अलग है सब,

हां माना मैंने अलग है सब।

मार गांधी के विचारों को गोली,

तुम मुझे राष्ट्रवाद सीखा रहे हो।

अरे किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो?


कलाम के अहसान तुमसे चुके नहीं अभी तक,

मोहम्मद क्या है किसे पढ़ा रहे हो?

बच्चो की चीखे तो तुमसे चुप हो ना सकी,

और मुझे अपना बड़प्पन दिखा रहे हो।

अरे भाई किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो?


हां है हम अलग,

मैं क्या और तुम क्या,

मेरी मां तक ने मेरे जैसा दूसरा नहीं जना,

सवा सौ करोड़ में मैं क्या और तुम क्या,

चमड़े की चप्पल पहन तुम मुझे,

चमड़ी का फर्क दिखा रहे हो?

अरे किस बात का डर दिखा रहे हो?



तुमने भगवान तो क्या शैतानों तक को अलग किया है।

किसी के ग्रहों में राहु तो किसी ने केतु को झांसा दिया है।

मेरे कर्म का फल मेरे मथे मंडा जाएगा,

तुम्हारे हिस्से का कोई और ना भोग पाएगा।

फिर क्यों ये इंसानी आगजनी भड़का रहे हो।

किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो।


इतिहास सबसे सच्चा गवाह रहा है।

साहूकारों के घर भी अकाल पड़ा है।

आज तुम त्यौरियां चढ़ा के बात करते हो,

तुम्हारा खुद का हिसाब पहले से हुआ पड़ा है।

अब क्या रह गया है, गाय के बदले बच्चे खा रहे हो।

आखिर किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो।


ये क्या कम है कि करोड़ों को तुम

बस कुछ मुठ्ठी भर बहला रहे हो।

इन बद्दिमाग अंधो की फौज को

तुम काने चरा रहे हो।

भाई किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो।


बहुत अलग है हम ,

ना सिर्फ हम बल्कि पूरा मेरा वतन,

सर पर हिमालय का ताज है तो

नीचे कटोरे में समाया हिन्द है।

कहीं रेतीले टीले है तो कहीं

गंगा से आशीष प्राप्त मिट्टी है।

हम सब अलग है यारों,

तुम कहां कहां किस किस को मार रहे हो।

आंख वालो को लालच से अंधा बना रहे हो।

किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो?


काश ये सारी ताकत और समझ हमें एक कर आगे बढ़ाने में लगाते,

जितनी हमें भेद कर तुम अलग करने में लगा रहे हो।

सीना चौड़ा कर घूमना था हमें जहां भर में जब,

तुम हंसी का पात्र बना रहे हो।

किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो।


हमें ये बचाना है।

हमें वो बचाना है।

बेटी बचानी है।

दौलत बचानी है।

बहू बचानी है।

बीवी बचानी है।

सांस बचानी है।

हवा बचानी है।

कुर्सी बचानी है।

उफ्फ यहां ठीक से गले की चैन नहीं बचाई जा रही।

बस तुम सबको खोखली आस में बांध रहे हो।

किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो।


फागुन की होली बैसाख में ना अाई,

अमावस की दीवाली कभी पूनम को ना अाई।

रचयिता का लिखा तुमसे बदला ना गया।

कौनसा बदला लेना सीखा रहे हो।

अरे किस बात का डर मुझे दिखा रहे हो


By Parul




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