Khwahishe
By Amrita Singh
ख़्वाहिशें भी अजीब होती हैं
कुछ ख़्वाहिशें रूह को सुकून देती है
तो कुछ बेइंतिहा तक़लीफ
कुछ ख़्वाहिशें इंसान को तबाह कर देती हैं
तो कुछ सिखाती हैं सिर्फ़ तहजी़ब
पर कौन तय करता है दायरा इन ख़्वाहिशों का।
ख़्वाहिशें कुछ पाने की
ख़्वाहिशें खुली हवा में साँस लेने की
कुछ अच्छा खाने की ख़्वाहिश हो
या फिर कहीं जाने की ख़्वाहिश
जो ख़्वाहिशें किसी के लिए आम हैं
वो किसी का सपना भी हो सकता है
एक ऐसा सपना जिसे पूरा करना भी महज़ एक ख़्वाब हो
क्या ख़्वाब टूटने के डर से छोड़ देना चाहिए ख़्वाहिशों को
क्या गलत है किसी दायरे से बढकर कोई ख़्वाहिश रखना
आखिर कौन तय करता है दायरा इन ख़्वाहिशों का।
उन बूढी आखों में खुशियों की चमक देखने की ख़्वाहिश
जिन हाथों ने सिखाया था बचपन में चलना
उनको हर कदम पर साथ ले चलने की ख़्वाहिश
जब ये ख़्वाहिश एक के लिए सही है तो दूसरे के लिए गलत कैसे
जब माँ-बाप का दर्जा समान है तो सही और गलत का सवाल कैसे
आखिर इस मसले पर भी इतना इंतियाज़ क्यूँ
जब ख़्वाहिशें दिल की हैं तो दिलों में इतना भेदभाव क्यूँ
सही और गलत का फैसला है ज़रा मुश्किल
पर आखिर कौन तय करता है दायरा इन ख़्वाहिशों का।
बस दो पल ठहर कर बात करने की ख़्वाहिश
बिना सवाल के दिल की बात कहने की ख़्वाहिश
किसी की दुनिया घूमने की ख़्वाहिश
तो किसी की अपने गाँव की सुकून भरी ज़िदगी की ख़्वाहिश
ख़्वाहिशें हजारों हैं, कुछ सही भी कुछ गलत भी
पर आखिर कौन तय करता है दायरा इन ख़्वाहिशों का।
By Amrita Singh

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