Kha Gayi
By Mohammad Imran Khan
ज़िम्मेदारियाँ पूरी करते-करते कब बूढ़ा हो गया l
ये ज़िम्मेदारियाँ मेरी जवानी खा गयी ll
गलत-फहमियाँ दूर करते-करते कब दुश्मन बन गया l
ये गलत-फहमियाँ मेरी दोस्ती खा गयी ll
सच बोलते-बोलते कब झूठा हो गया l
ये सच्चाई मेरी ईमानदारी खा गयी ll
मोहब्बत करते-करते कब बेवफ़ा हो गया l
ये मोहब्बत मेरी वफ़ा खा गयी ll
सबको खुश रखते-रखते कब रुसवां हो गया l
ये खुशियाँ मेरी सलाहियत खा गयी ll
मोमिन बनते-बनते कब मुनाफ़िक़ हो गया l
ये मोमिन-मुत्तक़ी मेरी मुख़लिसि खा गयी ll
By Mohammad Imran Khan

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