Ke Hunar Kahin
By Parul
के हुनर कहीं बनाया नहीं जाता,
के जज़्बात सिर्फ जुबां से बयां नहीं होते,
के दिल बस धड़कने के लिए नहीं है,
हिम्मत बस कागजों पर नहीं है,
जतन खुद से शुरू करता है अपना पहाड़ा,
के खुद से बड़ा इंसान कोई और नहीं है।
के हुनर कहीं बनाया नहीं जाता...
कहीं से सुर सीख लेना बड़ी बात नहीं,
ताल से जुड़े रहना भी हुनर है जनाब,
सिर्फ पत्थर ठोकर ही खाएगा ये जरूरी नहीं,
तराशने वाला हो तो उसी में भगवान है कहीं,
के हुनर कहीं बनाया नहीं जाता,
ये पैदा होता है,
ये महसूस होता है,
ये जज़्बाती है यकीं मानिए
ये करामाती है सही जानिए,
ये गरीब है, ये अमीर भी है,
सीधा जानिए ,हुनर को खुदा मानिए,
ये लगन में बसता है,
घरों से निकलता है,
आसमान को चुनौती देने वाला,
ये हुनर सारी दुनिया को
नाखून की नोक पर रखता है,
ये जब कलम उठाता है,
लफ्ज़ कतार में खड़े सलामी देते है,
ये लोहे से सुई निकालता है तो
इज्जत बहाली रखते है
के हुनर बनाया नहीं जाता,
कहीं तबले की ताल होती है,
घुंघरुओं की झंकार नाचती है,
तार सप्तक के अलाप की तरह
चारो दिशाओं में आवाज़ गूंजती है,
साधक होना जरूरी है,
सटीक होना जरूरी है,
बाधा आयेगी लेकिन
मछली की आंख छेदना जरूरी है।
हुनर है जनाब ये बनाया नहीं जाता,
उठेगा, सोचेगा, बढ़ेगा,
गिरेगा, संभलेगा, उड़ेगा,
थकेगा फिर सोएगा, लेकिन
फिर उठेगा, फिर सब वैसे ही चलेगा,
ये हुनर कहीं बनाया नहीं जाता,
भीतर की ही भट्टी में,
गार बनती मिट्टी मैं,
सपने हुनर से सींचेगा,
हर कोई तुझसे पूछेगा,
यही तुझे बताना है,
के हुनर बनाया नहीं जाता
ये पैदा होता है,
कभी लफ्जो में,
कभी रागो में,
कभी संगीत में,
कभी हाथो में,
कभी ख्याल भर से,
कभी सवाल भर से,
कभी दिक्कतों से,
कभी मशक्कतो से,
ये हुनर है जनाब ये
बनाया नहीं जाता ।
By Parul

Comments