Kalamkaar
By Pratiksha Singh
मशहूर नही पर वफादार हूं मैं
कलाकार नही कलमकार हूं मैं
चाहूं तो समंदर एक बूंद में सिमट जाए
मैं चाहूं तो एक बूंद से सागर भी बन जाए
कितनी ही अनगिनत कहानियों का किरदार हूं मैं
कलाकार नही कलमकार हूं मैं।
अपना हो या पराया, पर दर्द की समझ रखता हूं
जेब में पैसे हो न हो, मैं कलम हमेशा रखता हूं
अरमान खयाल और सवालों को भी ज़ुबान देने वाला एहसास हूं मैं
कलाकार नही कलमकार हूं मैं।
कितने ही ख्वाब मैंने नज़्म बना कर रखे है
कितने ही दर्द मैने किस्सों में छुपाकर रखे है
ख़ामोशी और शोर के बीच खड़ी दीवार हूं मैं
कलाकार नही कलमकार हूं मैं।
हर याद के हिसाब अल्फाजों में रखे है
मैने दुनिया से कितने ही राज़ छुपा रखे है
कुछ बयां भी करता हूं,कुछ ख़ामोश भी है
कुछ गुमनाम है, तो कुछ मशहूर भी है
कुछ कही अनकही सी दास्तान हूं मैं
कलाकार नही कलमकार हूं मैं।
By Pratiksha Singh

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