Kagaz Ki Ghadi
By Gopal Ahir
एक घड़ि है मेरे पास,
थोड़ी टूटी सी ही सही,
पर वक़्त आज भी बताती है,
जभी देखता हूँ उसे,
दिल का हाल आज भी कहती है मुझे,
ना लाखो मे एक,
ना हज़ारो में,
पूरी कायनात मे बस एक,
छुपा रखा है उसे मेने,
नाज़ूक सी है वोह थोड़ी,
फूलों सी बनी,
मेरी कागज की घड़ी,
नाम है लिखा मेरा,
प्यार भरे हाथों से,
थोड़ी नम आखों से,
हलकी हलकी सांसों से,
कहलाती है कागज की बनी,
पर वजन उसका सबसे ज़्यादा,
रिश्ता है उसमे बंधा,
एक टुटा सा, बिखरा सा,
मस्त मलंग सा,
कहने ने के लिए बस एक घड़ी,
पर है एक कविता प्यारी सी,
मेरे लिए लिखी हुई,
अच्छा वक़्त भी आया,
बुरा वक़्त भी आया,
पर वह रही थमी थमी,
जब पेहनी मेने दुबारा,
तो कहा उसने "अब याद आई मेरी"
वोह एक मेरी,
कागज की घड़ी।
By Gopal Ahir

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