Kaash!
Updated: Aug 2, 2025
By Ankit Samariya
काश कुछ लोग पहले मिले होते
तो हमने कुछ अलग सपने सजाए होते
वो नही थे, तो कोई और था साथ हमारे
उन्हें मिलकर भी लगा, की काश वो पहले मिले होते
जो मिले पहले, क्या उनकी अब कद्र नहीं
या जो मिले अब, है उनकी कहीं ज्यादा ही
क्या में कर भी रहा हूं साथ उनके सही
अगर नहीं, तो क्या में मतलबी हूं कहीं
जो घटित हो रहा है, क्या ये सिर्फ ये एक दौर है?
और निकल जायेगा ये भी कुछ दिनों में ही?
या फिर है ये रोशनी, जो रहेगी सदेव ही
परंतु इस जीवन में, स्थाई कुछ है नहीं
जो स्थाई है भी, वो है सिर्फ परिवर्तन
बंधे हुए, कर रहे अपने कर्तव्यों का निर्वर्तन
इल्म भी बखूबी है अपनी बंदिशों का हमें
यूं तो कईं लिबासों ने लुभाया हमें बाज़ार में
बंदिशों का लिहाज़ कर, छोड़ आए भरे बाजार में
By Ankit Samariya

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