Kaabiliyat
By Devesh Shrivastava
देखे कई चेहरों को चेहरे लिए,
खालिस कांच के टुकड़ों को
शामों- सहर पहरे लिए।
जब किस्मत होती मेहरबान तो
छू लेते हैं आसमान कई,
छुपी कोहरों में
काबिलियत कहीं,
देखी है मैंने
अगर इतनी ही आसान होती
ज़िन्दगी तो,
काबिलियत धूलें नहीं फाका करती।।
By Devesh Shrivastava

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