Jindagi Ya Kitaab
By Pritesh Maheshwari
सोचता हूँ ज़िंदगी को एक ‘किताब’ में बदल दूँ..
जो कभी पन्नो को पलट के देखूँ तो मेरा तजुर्बा तो बताए..
कुछ ऐसे क़िस्से हो इसमें जिन्हें जब भी पढ़ूँ मन ख़ूश हो जाए..
कुछ ऐसी यादें भी हो.. जो कभी भी भूलें ना भुलाये..
ऐसा नहीं बनाऊँगा की ये एक खाते सी नज़र आए..
नहीं तो बस नफ़े और नुक़सान को आकने में रह जाऊँगा..
ये मेरे गुज़रे हुए समय की वो परछाईं हो..
जो मुझे समझाए कि मैं आगे और क्या कर पाऊँगा..
उम्मीद करता हूँ की जब कभी इसे पढ़ने बैठूँगा तो पछताऊँगा नहीं कि कुछ ख़ास नहीं किया..
कुछ ऐसा भी पढ़ना चाहूँगा कि ये ना लगे कि कभी किसी का साथ ना दिया..
इतनी मेहेरबानी करी है मालिक तूने.. थोड़ी सी इनायत और करना..
जितने भी पन्ने लिखवायेगा.. उनमे स्याही बस किसी ना किसी की दुआँओं की भरना..!
By Pritesh Maheshwari

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