Jal Ki Boond
By Sanchita
काश! मैं जल की वो बूंद होती
जो हिम का रूप ले, शिख की शोभा बढ़ाती
उड़ जाती आकाश में, घटा बन जाती
उमड़-घुमड़ कर, मयूर को संग नचाती
हवा के झोंको के साथ, दुनिया की सैर कर आती
पुलकित कर सबका मन, धरा की प्यास बुझाती
फूलों की पंखुड़ियों पे बैठ, थोड़ा सुस्ताती
मेरे स्पर्श से जब तुम्हारा रोम रोम खिलता, तो मैं मुस्काती
जो मुझे अनदेखा कर फिसलता, उसे देख मैं जोर से खिलखिलाती..
जब उस सुंदरी के केश से, मैं तुम्हारे चेहरे पे आती
तो मैं भी इठलाती,
रणभेरी के लिए जाता जब वो, मैं तुम्हारे आंखों के कोर में छिप जाती,
तुम्हारे पत्र में सिमट, तुम्हारे प्रेम को उस तक पहुंचाती
जब वो विजय पताका लहराए आता, तुम्हारी खुशी के साथ मैं भी छलक जाती..
मैं जीवन के हर रंग में मिल जाती,
जब आत्मा का परमात्मा से मेल होता,
मैं गंगा जल बन, तुझमें विलीन हो जाती
काश! मैं जल की वो अनमोल बूंद होती,
जिसका मोल तुम समझते,
और मैं जीवन के हर पल में तुम्हारे साथ होती।
By Sanchita

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